कदमों पर निसार कर दिया और तुम्हारा सब कुछ पाकर ही मैं संतुष्ट हो सकता हूं। तुम मेरी हो, मैं तुम्हारा हूं। किसी तीसरी औरत या मर्द को हमारे बीच में आने का मजाज़ नहीं है,जब तक मैं मर न जाऊं।'
ज़ोहरा की आंखें चमक रही थीं , उसने रमा की गरदन में हाथ डालकर कहा, 'ऐसी बात मुंह से न निकालो, प्यारे! '
अड़तालीस
सारे दिन रमा उद्वेग के जंगलों में भटकता रहा। कभी निराशा की अंधाकारमय घाटियां सामने आ जातीं, कभी आशा की लहराती हुई
कदमों पर निसार कर दिया और तुम्हारा सब कुछ पाकर ही मैं संतुष्ट हो सकता हूं। तुम मेरी हो, मैं तुम्हारा हूं। किसी तीसरी औरत या मर्द को हमारे बीच में आने का मजाज़ नहीं है,जब तक मैं मर न जाऊं।'
ज़ोहरा की आंखें चमक रही थीं , उसने रमा की गरदन में हाथ डालकर कहा, 'ऐसी बात मुंह से न निकालो, प्यारे! '
अड़तालीस
सारे दिन रमा उद्वेग के जंगलों में भटकता रहा। कभी निराशा की अंधाकारमय घाटियां सामने आ जातीं, कभी आशा की लहराती हुई