और खूब लज्जित करने के बाद यह हाल कहेगी, लेकिन जब घर में पहुंची तो रमानाथ का कहीं पता न था।
जागेश्वरी ने पूछा, 'कहां चली गई थीं इस धूप में?'
जालपा-'एक काम से चली गई थी। आज उन्होंने भोजन नहीं किया, न जाने कहां चले गए।'
जागेश्वरी--'दफ्तर गए होंगे।'
जालपा-'नहीं, दफ्तर नहीं गए। वहां से एक चपरासी पूछने आया था।'
यह कहती हुई वह ऊपर चली गई, बचे हुए रूपये संदूक में रखे और पंखा झलने लगी। मारे गरमी के देह फुंकी जा रही थी,
और खूब लज्जित करने के बाद यह हाल कहेगी, लेकिन जब घर में पहुंची तो रमानाथ का कहीं पता न था।
जागेश्वरी ने पूछा, 'कहां चली गई थीं इस धूप में?'
जालपा-'एक काम से चली गई थी। आज उन्होंने भोजन नहीं किया, न जाने कहां चले गए।'
जागेश्वरी--'दफ्तर गए होंगे।'
जालपा-'नहीं, दफ्तर नहीं गए। वहां से एक चपरासी पूछने आया था।'
यह कहती हुई वह ऊपर चली गई, बचे हुए रूपये संदूक में रखे और पंखा झलने लगी। मारे गरमी के देह फुंकी जा रही थी,