गबन - Gaban

थोड़ी देर बाद जालपा ने संदूक से पांच सौ रूपये निकाले और दयानाथ के पास जाकर बोली,यह रूपये लीजिए, नारायणदास के पास भिजवा दीजिए। बाकी रूपये भी मैं जल्द ही दे दूंगी। दयानाथ ने झेंपकर कहा, ''रूपये कहां मिल गए?' जालपा ने निसंकोच होकर कहा, 'रतन के हाथ कंगन बेच दिया।' दयानाथ उसका मुंह ताकने लगे।

चौबीस

एक महीना गुजर गया। प्रयाग के सबसे अधिक छपने वाले दैनिक पत्र में एक नोटिस निकल रहा है, जिसमें रमानाथ के घर लौट आने की प्रेरणा दी गई है,


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थोड़ी देर बाद जालपा ने संदूक से पांच सौ रूपये निकाले और दयानाथ के पास जाकर बोली,यह रूपये लीजिए, नारायणदास के पास भिजवा दीजिए। बाकी रूपये भी मैं जल्द ही दे दूंगी। दयानाथ ने झेंपकर कहा, ''रूपये कहां मिल गए?' जालपा ने निसंकोच होकर कहा, 'रतन के हाथ कंगन बेच दिया।' दयानाथ उसका मुंह ताकने लगे।

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एक महीना गुजर गया। प्रयाग के सबसे अधिक छपने वाले दैनिक पत्र में एक नोटिस निकल रहा है, जिसमें रमानाथ के घर लौट आने की प्रेरणा दी गई है,


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