कोई कहता है, सरकारी रकम खा गए थे।'
जालपा-'जिसने आपसे यह कहा, उसने सरासर झूठ कहा।'
दीनदयाल-'तो फिर क्यों चले गए? '
जालपा-'यह मैं बिलकुल नहीं जानती। मुझे बार-बार ख़ुद यही शंका होती है।'
दीनदयाल-'लाला दयानाथ से तो झगडानहीं हुआ? '
जालपा-'लालाजी के सामने तो वह सिर तक नहीं उठाते, पान तक नहीं खाते, भला झगडा क्या करेंगे। उन्हें घूमने का शौक था। सोचा होगा,यों तो कोई जाने न देगा, चलो भाग चलें।'
दीनदयाल-' शायद ऐसा ही
कोई कहता है, सरकारी रकम खा गए थे।'
जालपा-'जिसने आपसे यह कहा, उसने सरासर झूठ कहा।'
दीनदयाल-'तो फिर क्यों चले गए? '
जालपा-'यह मैं बिलकुल नहीं जानती। मुझे बार-बार ख़ुद यही शंका होती है।'
दीनदयाल-'लाला दयानाथ से तो झगडानहीं हुआ? '
जालपा-'लालाजी के सामने तो वह सिर तक नहीं उठाते, पान तक नहीं खाते, भला झगडा क्या करेंगे। उन्हें घूमने का शौक था। सोचा होगा,यों तो कोई जाने न देगा, चलो भाग चलें।'
दीनदयाल-' शायद ऐसा ही