में व्याप्त हो रही है। जब वह स्नान करके ऊपर आई, तो रतन ने पूछा, 'डुबा दिया?'
जालपा-'हां।'
रतन-'बडी निठुर हो'
जालपा-'यही निठुरता मन पर विजय पाती है। अगर कुछ दिन पहले निठुर हो जाती, तो आज यह दिन क्यों आता। कार चल पड़ी।
पच्चीस
रमानाथ को कलकत्ता आए दो महीने के ऊपर हो गए हैं। वह अभी तक देवीदीन के घर पडाहुआ है। उसे हमेशा यही धुन सवार रहती है कि रूपये कहां से आवें, तरह-तरह के मंसूबे बांधाता है, भांति-भांति की कल्पनाएं करता है,
में व्याप्त हो रही है। जब वह स्नान करके ऊपर आई, तो रतन ने पूछा, 'डुबा दिया?'
जालपा-'हां।'
रतन-'बडी निठुर हो'
जालपा-'यही निठुरता मन पर विजय पाती है। अगर कुछ दिन पहले निठुर हो जाती, तो आज यह दिन क्यों आता। कार चल पड़ी।
पच्चीस
रमानाथ को कलकत्ता आए दो महीने के ऊपर हो गए हैं। वह अभी तक देवीदीन के घर पडाहुआ है। उसे हमेशा यही धुन सवार रहती है कि रूपये कहां से आवें, तरह-तरह के मंसूबे बांधाता है, भांति-भांति की कल्पनाएं करता है,