चलकर कपड़े दरजी को दे देंगे। मैं भी जब तक खा लूं।'
शाम को देवीदीन ने आकर कहा, 'चलो भैया, अब तो अंधेरा हो गया।'
रमा सिर पर हाथ धरे बैठा हुआ था। मुख पर उदासी छाई हुई थी। बोला, 'दादा, मैं घर न जाऊंगा।'
देवीदीन ने चकित होकर पूछा, 'क्यों क्या बात हुई?'
रमा की आंखें सजल हो गई। बोला, 'कौन?सा मुंह लेकर जाऊं, दादा! मुझे तो डूब मरना चाहिए था।'
यह कहते-कहते वह खुलकर रो पड़ा। वह वेदना जो अब तक मूर्छित पड़ी थी, शीतल जल
चलकर कपड़े दरजी को दे देंगे। मैं भी जब तक खा लूं।'
शाम को देवीदीन ने आकर कहा, 'चलो भैया, अब तो अंधेरा हो गया।'
रमा सिर पर हाथ धरे बैठा हुआ था। मुख पर उदासी छाई हुई थी। बोला, 'दादा, मैं घर न जाऊंगा।'
देवीदीन ने चकित होकर पूछा, 'क्यों क्या बात हुई?'
रमा की आंखें सजल हो गई। बोला, 'कौन?सा मुंह लेकर जाऊं, दादा! मुझे तो डूब मरना चाहिए था।'
यह कहते-कहते वह खुलकर रो पड़ा। वह वेदना जो अब तक मूर्छित पड़ी थी, शीतल जल