सामने उद्यान में चांदनी द्दहरे की चादर ओढ़े, ज़मीन पर पड़ी सिसक रही थी। फल और पौधो मलिन मुख, सिर झुकाए, आशा और भय से विकल हो-होकर मानो उसके वक्ष पर हाथ रखते थे, उसकी शीतल देह को स्पर्श करते थे और आंसू की दो बूंदें गिराकर फिर उसी भांति देखने लगते थे। सहसा वकील साहब ने आंखें खोलीं। आंखों के दोनों कोनों में आंसू की बूंदें मचल रही थीं।
क्षीण स्वर में बोले, 'टीमल! क्या सिद्धू आए थे?'
फिर इस प्रश्न पर आप ही लज्जित हो मुस्कराते हुए बोले,
सामने उद्यान में चांदनी द्दहरे की चादर ओढ़े, ज़मीन पर पड़ी सिसक रही थी। फल और पौधो मलिन मुख, सिर झुकाए, आशा और भय से विकल हो-होकर मानो उसके वक्ष पर हाथ रखते थे, उसकी शीतल देह को स्पर्श करते थे और आंसू की दो बूंदें गिराकर फिर उसी भांति देखने लगते थे। सहसा वकील साहब ने आंखें खोलीं। आंखों के दोनों कोनों में आंसू की बूंदें मचल रही थीं।
क्षीण स्वर में बोले, 'टीमल! क्या सिद्धू आए थे?'
फिर इस प्रश्न पर आप ही लज्जित हो मुस्कराते हुए बोले,