से देखा। वह बिना जवाब की अपेक्षा किए चुपके-से चला गया।
मगर एक ही क्षण में रतन को महराज पर दया आ गई। उसने कौन-सी बुराई की जो भोजन के लिए पूछने आया। भोजन भी ऐसी चीज़ है, जिसे कोई छोड़ सके! वह रसोई में जाकर महराज से बोली, 'तुम लोग खा लो, महराज! मुझे आज भूख नहीं लगी है।'
महराज ने आग्रह किया, 'दो ही फुलके खा लीजिए, सरकार!'
रतन ठिठक गई। महराज के आग्रह में इतनी सह्रदयता, इतनी संवेदना भरी हुई थी कि रतन को एक प्रकार की सांत्वना का अनुभव हुआ। यहां कोई अपना नहीं है,
से देखा। वह बिना जवाब की अपेक्षा किए चुपके-से चला गया।
मगर एक ही क्षण में रतन को महराज पर दया आ गई। उसने कौन-सी बुराई की जो भोजन के लिए पूछने आया। भोजन भी ऐसी चीज़ है, जिसे कोई छोड़ सके! वह रसोई में जाकर महराज से बोली, 'तुम लोग खा लो, महराज! मुझे आज भूख नहीं लगी है।'
महराज ने आग्रह किया, 'दो ही फुलके खा लीजिए, सरकार!'
रतन ठिठक गई। महराज के आग्रह में इतनी सह्रदयता, इतनी संवेदना भरी हुई थी कि रतन को एक प्रकार की सांत्वना का अनुभव हुआ। यहां कोई अपना नहीं है,