गोपी इधर कई महीनों से कसरत करता था। चलता तो मुडढे और छाती को देखा करता। देखने वालों को तो वह ज्यों का त्यों मालूम होता है, पर अपनी नज़र में वह कुछ और हो गया था। शायद उसे आश्चर्य होता था कि उसे आते देखकर क्यों लोग रास्ते से नहीं हट जाते, क्यों उसके डील-डौल से भयभीत नहीं हो जाते। अकड़कर बोला, 'किसी ने ज़रा चीं-चपड़ की तो तोड़ दूंगा।'
रतन मुस्कराई, 'यह तो मुझे मालूम है। सो मत जाना।'
गोपी, 'पलक तक तो झपकेगी नहीं। मजाल है नींद आ जाय।'
गोपी इधर कई महीनों से कसरत करता था। चलता तो मुडढे और छाती को देखा करता। देखने वालों को तो वह ज्यों का त्यों मालूम होता है, पर अपनी नज़र में वह कुछ और हो गया था। शायद उसे आश्चर्य होता था कि उसे आते देखकर क्यों लोग रास्ते से नहीं हट जाते, क्यों उसके डील-डौल से भयभीत नहीं हो जाते। अकड़कर बोला, 'किसी ने ज़रा चीं-चपड़ की तो तोड़ दूंगा।'
रतन मुस्कराई, 'यह तो मुझे मालूम है। सो मत जाना।'
गोपी, 'पलक तक तो झपकेगी नहीं। मजाल है नींद आ जाय।'