रमानाथ-'कुछ नहीं, दो-एक खरोंचे लग गए। मैं बहुत बचाकर निकला।'
देवीदीन-'बहू की चिट्ठी मिल गई न? '
रमानाथ-'हां, उसी वक्त मिल गई थी। क्या वह भी तुम्हारे साथ थी? '
देवीदीन-'वह मेरे साथ नहीं थीं, मैं उनके साथ था। जब से तुम्हें मोटर पर आते देखा, तभी से जाने-जाने लगाए हुए थीं।'
रमानाथ-'तुमने कोई ख़त लिखा था? '
देवीदीन-'मैंने कोई ख़त-पत्तर नहीं लिखा भैया। जब वह आई तो मुझे आप ही अचंभा हुआ कि बिना जाने-बूझे कैसे आ गई।
रमानाथ-'कुछ नहीं, दो-एक खरोंचे लग गए। मैं बहुत बचाकर निकला।'
देवीदीन-'बहू की चिट्ठी मिल गई न? '
रमानाथ-'हां, उसी वक्त मिल गई थी। क्या वह भी तुम्हारे साथ थी? '
देवीदीन-'वह मेरे साथ नहीं थीं, मैं उनके साथ था। जब से तुम्हें मोटर पर आते देखा, तभी से जाने-जाने लगाए हुए थीं।'
रमानाथ-'तुमने कोई ख़त लिखा था? '
देवीदीन-'मैंने कोई ख़त-पत्तर नहीं लिखा भैया। जब वह आई तो मुझे आप ही अचंभा हुआ कि बिना जाने-बूझे कैसे आ गई।