चालीस
रमा मुंह-अंधेरे अपने बंगले जा पहुंचा। किसी को कानों-कान ख़बर न हुई। नाश्ता करके रमा ने ख़त साफ किया, कपड़े पहने और दारोग़ा के पास जा पहुंचा। त्योरियां चढ़ी हुई थीं। दारोग़ा ने पूछा, 'ख़ैरियत तो है, नौकरों ने कोई शरारत तो नहीं की।'
रमा ने खड़े-खड़े कहा, 'नौकरों ने नहीं, आपने शरारत की है, आपके मातहतों, अफसरों और सब ने मिलकर मुझे उल्लू बनाया है।'
दारोग़ा ने कुछ घबडाकर पूछा, आख़िर बात क्या है, कहिए तो? '
रमानाथ-'बात
चालीस
रमा मुंह-अंधेरे अपने बंगले जा पहुंचा। किसी को कानों-कान ख़बर न हुई। नाश्ता करके रमा ने ख़त साफ किया, कपड़े पहने और दारोग़ा के पास जा पहुंचा। त्योरियां चढ़ी हुई थीं। दारोग़ा ने पूछा, 'ख़ैरियत तो है, नौकरों ने कोई शरारत तो नहीं की।'
रमा ने खड़े-खड़े कहा, 'नौकरों ने नहीं, आपने शरारत की है, आपके मातहतों, अफसरों और सब ने मिलकर मुझे उल्लू बनाया है।'
दारोग़ा ने कुछ घबडाकर पूछा, आख़िर बात क्या है, कहिए तो? '
रमानाथ-'बात