मैं वहां पहुंचा दूं।'
रतन ने व्यंग्यमय आंखों से देखकर कहा, 'तुमने पंद्रह रूपये का मकान मेरे लिए व्यर्थ लिया! इतना बडा मकान लेकर मैं क्या करूंगी! मेरे लिए एक कोठरी काफी है, जो दो रूपये में मिल जायगी। सोने के लिए जमीन है ही। दया का बोझ सिर पर जितना कम हो, उतना ही अच्छा!
मणिभूषण ने बडे विनम्र भाव से कहा, 'आख़िर आप चाहती क्या हैं?उसे कहिए तो!'
रतन उत्तेजित होकर बोली, 'मैं कुछ नहीं चाहती। मैं इस घर का एक तिनका भी अपने
मैं वहां पहुंचा दूं।'
रतन ने व्यंग्यमय आंखों से देखकर कहा, 'तुमने पंद्रह रूपये का मकान मेरे लिए व्यर्थ लिया! इतना बडा मकान लेकर मैं क्या करूंगी! मेरे लिए एक कोठरी काफी है, जो दो रूपये में मिल जायगी। सोने के लिए जमीन है ही। दया का बोझ सिर पर जितना कम हो, उतना ही अच्छा!
मणिभूषण ने बडे विनम्र भाव से कहा, 'आख़िर आप चाहती क्या हैं?उसे कहिए तो!'
रतन उत्तेजित होकर बोली, 'मैं कुछ नहीं चाहती। मैं इस घर का एक तिनका भी अपने