सवोर्त्कृष्ट मायामूर्ति को जो परकृति ने किसी अज्ञात कारण से इस असार, मायावी संसार को परदान की है।'
पापनाशी के हृदय पर इस कथन का एकएक शब्द वजर के समान पड़ रहा था। अन्त में वह इन अपशब्दों से परतिध्वनित हुआ-हा ! दुर्जन, दुष्ट, पापी ! मैं तुझसे घृणा करता हूं और तुझे तुच्छ समझता हूं ! दूर हो यहां से, नरक के दूत, उन दुर्बल, दुःखी म्लेच्छों से भी हजार गुना निकृष्ट, जो अभी मुझे पत्थरों और दुर्वचनों का निशाना बना रहे थे ! वह अज्ञानी थे,
सवोर्त्कृष्ट मायामूर्ति को जो परकृति ने किसी अज्ञात कारण से इस असार, मायावी संसार को परदान की है।'
पापनाशी के हृदय पर इस कथन का एकएक शब्द वजर के समान पड़ रहा था। अन्त में वह इन अपशब्दों से परतिध्वनित हुआ-हा ! दुर्जन, दुष्ट, पापी ! मैं तुझसे घृणा करता हूं और तुझे तुच्छ समझता हूं ! दूर हो यहां से, नरक के दूत, उन दुर्बल, दुःखी म्लेच्छों से भी हजार गुना निकृष्ट, जो अभी मुझे पत्थरों और दुर्वचनों का निशाना बना रहे थे ! वह अज्ञानी थे,