ईश्वर के परेम से परिपूर्ण हो जाने के कारण वह हाथों से कोई काम न करती थीं; केवल ध्यान, आराधना और स्वगीर्य आनन्द में निमग्न रहती थीं। इसलिए उन्हें 'माता मरियम की पुत्रियां' कहते थे, और वह उज्ज्वल वस्त्र ही घारण करती थीं। जो स्त्रियां हाथों से कामधन्धा करती थीं, वह 'माथी की पुत्रियां' कहलाती थीं और नीचे वस्त्र पहनती थीं। सभी स्त्रियां कनटोप लगाती थीं, केवल युवतियां बालों के दोचार गुच्छे माथे पर निकाले रहती थीं-सम्भवतः वह आपही-आप बाहर निकल आते थे,
ईश्वर के परेम से परिपूर्ण हो जाने के कारण वह हाथों से कोई काम न करती थीं; केवल ध्यान, आराधना और स्वगीर्य आनन्द में निमग्न रहती थीं। इसलिए उन्हें 'माता मरियम की पुत्रियां' कहते थे, और वह उज्ज्वल वस्त्र ही घारण करती थीं। जो स्त्रियां हाथों से कामधन्धा करती थीं, वह 'माथी की पुत्रियां' कहलाती थीं और नीचे वस्त्र पहनती थीं। सभी स्त्रियां कनटोप लगाती थीं, केवल युवतियां बालों के दोचार गुच्छे माथे पर निकाले रहती थीं-सम्भवतः वह आपही-आप बाहर निकल आते थे,