निरूपण में सदैव रत रहती थी। धर्मतत्तवों को बुध्दि की कसौटी पर कसना उसका स्वाभाविक गुण था, और जब तक तर्क-बुध्दि स्वीकार न करे, वह केवल धर्म-ग्रंथों के आधार पर किसी सिध्दांत को न मान सकती थी। जब उसके मन में कोई शंका होती, तो वह प्रभु सेवक की सहायता से उसके निवारण की चेष्टा किया करती।
सोफ़िया-मैं इस विषय पर बड़ी देर से गौर कर रही हूँ; पर कुछ समझ में नहीं आता। प्रभु मसीह ने दरिद्रता को इतना महत्व क्यों दिया और धान-वैभव को क्यों निषिध्द बतलाया?
निरूपण में सदैव रत रहती थी। धर्मतत्तवों को बुध्दि की कसौटी पर कसना उसका स्वाभाविक गुण था, और जब तक तर्क-बुध्दि स्वीकार न करे, वह केवल धर्म-ग्रंथों के आधार पर किसी सिध्दांत को न मान सकती थी। जब उसके मन में कोई शंका होती, तो वह प्रभु सेवक की सहायता से उसके निवारण की चेष्टा किया करती।
सोफ़िया-मैं इस विषय पर बड़ी देर से गौर कर रही हूँ; पर कुछ समझ में नहीं आता। प्रभु मसीह ने दरिद्रता को इतना महत्व क्यों दिया और धान-वैभव को क्यों निषिध्द बतलाया?