इंदु-क्या तुम अपने मामा और पापा के अधीन नहीं रहना चाहतीं?
सोफ़िया-न, पराधीनता में प्रकार का नहीं, केवल मात्राओं का अंतर है।
इंदु-तो मेरे ही घर क्यों नहीं रहतीं? मैं इसे अपना सौभाग्य समझ्रूगी! और अम्माँजी तो तुम्हें ऑंखों की पुतली बनाकर रखेंगी। मैं चली जाती हूँ, तो वह अकेले घबराया करती हैं। तुम्हें पा जाएँ तो फिर गला न छोड़ें। कहो तो अम्माँ से कहूँ? यहाँ तुम्हारी स्वाधीनता में कोई दखल न देगा। बोलो, कहूँ जाकर अम्माँ से?
इंदु-क्या तुम अपने मामा और पापा के अधीन नहीं रहना चाहतीं?
सोफ़िया-न, पराधीनता में प्रकार का नहीं, केवल मात्राओं का अंतर है।
इंदु-तो मेरे ही घर क्यों नहीं रहतीं? मैं इसे अपना सौभाग्य समझ्रूगी! और अम्माँजी तो तुम्हें ऑंखों की पुतली बनाकर रखेंगी। मैं चली जाती हूँ, तो वह अकेले घबराया करती हैं। तुम्हें पा जाएँ तो फिर गला न छोड़ें। कहो तो अम्माँ से कहूँ? यहाँ तुम्हारी स्वाधीनता में कोई दखल न देगा। बोलो, कहूँ जाकर अम्माँ से?