रंगभूमि - Rangbhumi

कई बार जाकर दरियाफ्त करता। उसे विश्वास होता जाता था कि सोफी हमसे सदा के लिए विदा हो गई। आज भी, रोज की भाँति, एक बजे थका-माँदा, उदास और निराश लौटकर आया, तो जॉन सेवक ने शुभ सूचना दी-सोफ़िया का पता मिल गया।

प्रभु सेवक का चेहरा खिल उठा। बोला-सच! कहाँ? क्या उसका कोई पत्र आया है?

जॉन सेवक-कुँवर भरतसिंह के मकान पर है। जाओ, खाना खा लो। तुम्हें भी वहाँ चलना है।

प्रभु सेवक-मैं तो लौटकर खाना खाऊँगा। भूख गायब हो गई। है तो अच्छी तरह?


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कई बार जाकर दरियाफ्त करता। उसे विश्वास होता जाता था कि सोफी हमसे सदा के लिए विदा हो गई। आज भी, रोज की भाँति, एक बजे थका-माँदा, उदास और निराश लौटकर आया, तो जॉन सेवक ने शुभ सूचना दी-सोफ़िया का पता मिल गया।

प्रभु सेवक का चेहरा खिल उठा। बोला-सच! कहाँ? क्या उसका कोई पत्र आया है?

जॉन सेवक-कुँवर भरतसिंह के मकान पर है। जाओ, खाना खा लो। तुम्हें भी वहाँ चलना है।

प्रभु सेवक-मैं तो लौटकर खाना खाऊँगा। भूख गायब हो गई। है तो अच्छी तरह?


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