रंगभूमि - Rangbhumi

तो क्या ये लोग इतना भी करने से रहे?

सोफ़िया-नहीं मामा, ये लोग अत्यंत सुशील और सज्ज़न हैं। खुद रानीजी प्राय: मेरे पास बैठी पंखा झलती रहती हैं। कुँवर साहब दिन में कई बार आकर देख जाते हैं, और इंदु से तो मेरा बहनापा-सा हो गया है। यही लड़की है, जो मेरे साथ नैनीताल में पढ़ा करती थी।

मिसेज़ सेवक-(चिढ़कर) तुझे दूसरों में सब गुण-ही-गुण नजर आते हैं। अवगुण सब घरवालों ही के हिस्से में पड़े हैं। यहाँ तक कि दूसरे धर्म भी अपने धर्म से अच्छे हैं।


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तो क्या ये लोग इतना भी करने से रहे?

सोफ़िया-नहीं मामा, ये लोग अत्यंत सुशील और सज्ज़न हैं। खुद रानीजी प्राय: मेरे पास बैठी पंखा झलती रहती हैं। कुँवर साहब दिन में कई बार आकर देख जाते हैं, और इंदु से तो मेरा बहनापा-सा हो गया है। यही लड़की है, जो मेरे साथ नैनीताल में पढ़ा करती थी।

मिसेज़ सेवक-(चिढ़कर) तुझे दूसरों में सब गुण-ही-गुण नजर आते हैं। अवगुण सब घरवालों ही के हिस्से में पड़े हैं। यहाँ तक कि दूसरे धर्म भी अपने धर्म से अच्छे हैं।


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