रंगभूमि - Rangbhumi



'ज्ञान-मान जहँ एकौ नाहीं, देखत ब्रह्म रूप सब गाहीं।'

इन झगड़ों में मत पड़ो।

सूरदास-बाबाजी, जब तक भगवान् की दया न होगी, भक्ति और वैराग्य किसी पर मन न जमेगा। इस घड़ी मेरा हृदय रो रहा है, उसमें उपदेश और ज्ञान की बातें नहीं पहुँच सकतीं। गीली लकड़ी खराद पर नहीं चढ़ती।

दयागिरि-पछताओगे और क्या।

यह कहकर दयागिरि अपनी राह चले गए। वह नित्य गंगा-स्नान को जाया करते थे।

उनके जाने के बाद सूरदास ने अपने मन में कहा-यह भी मुझी


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'ज्ञान-मान जहँ एकौ नाहीं, देखत ब्रह्म रूप सब गाहीं।'

इन झगड़ों में मत पड़ो।

सूरदास-बाबाजी, जब तक भगवान् की दया न होगी, भक्ति और वैराग्य किसी पर मन न जमेगा। इस घड़ी मेरा हृदय रो रहा है, उसमें उपदेश और ज्ञान की बातें नहीं पहुँच सकतीं। गीली लकड़ी खराद पर नहीं चढ़ती।

दयागिरि-पछताओगे और क्या।

यह कहकर दयागिरि अपनी राह चले गए। वह नित्य गंगा-स्नान को जाया करते थे।

उनके जाने के बाद सूरदास ने अपने मन में कहा-यह भी मुझी


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