इधार कुछ दिनों से मिस्टर जॉन सेवक के यहाँ स्थायी रूप से नौकर हो गए थे। उनके आचार-विचार अपने पिता से बिलकुल निराले थे। रोजा-नमाज के पाबंद और नीयत के साफ थे। हराम की कमाई से कोसों भागते थे। उनकी माँ तो मर चुकी थीं; पर दोनों विमाताएँ जीवित थीं। विवाह भी हो चुका था; स्त्री के अतिरिक्त एक लड़का था-साबिर अली, और एक लड़की-नसीमा। इतना बड़ा कुटुम्ब था और 30 रुपये मासिक आय! इस महँगी के समय में, जबकि इससे पँचगुनी आमदनी में सुचारु रूप से निर्वाह नहीं होता,
इधार कुछ दिनों से मिस्टर जॉन सेवक के यहाँ स्थायी रूप से नौकर हो गए थे। उनके आचार-विचार अपने पिता से बिलकुल निराले थे। रोजा-नमाज के पाबंद और नीयत के साफ थे। हराम की कमाई से कोसों भागते थे। उनकी माँ तो मर चुकी थीं; पर दोनों विमाताएँ जीवित थीं। विवाह भी हो चुका था; स्त्री के अतिरिक्त एक लड़का था-साबिर अली, और एक लड़की-नसीमा। इतना बड़ा कुटुम्ब था और 30 रुपये मासिक आय! इस महँगी के समय में, जबकि इससे पँचगुनी आमदनी में सुचारु रूप से निर्वाह नहीं होता,