रंगभूमि - Rangbhumi

ओ आदमी! जरा यहाँ आना, तुम्हें अम्माँ बुला रही हैं।

बजरंगी लौट पड़ा, कुछ आस बँधी। आकर फिर बरामदे में खड़ा हो गया। जैनब टाट के परदे की आड़ में खड़ी थीं, पूछा-क्या बात थी जी?

बजरंगी-वही जमीन की बातचीत थी। साहब इसे लेने को कहते हैं। हमारा गुजर-बसर इसी जमीन से होता है! मुंसीजी से कह रहा हूँ, किसी तरह इस झगड़े को मिटा दीजिए। नजर-नियाज देने को भी तैयार हूँ, मुआ मुंसीजी सुनते ही नहीं।

जैनब-सुनेंगे क्यों नहीं, सुनेंगे न


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ओ आदमी! जरा यहाँ आना, तुम्हें अम्माँ बुला रही हैं।

बजरंगी लौट पड़ा, कुछ आस बँधी। आकर फिर बरामदे में खड़ा हो गया। जैनब टाट के परदे की आड़ में खड़ी थीं, पूछा-क्या बात थी जी?

बजरंगी-वही जमीन की बातचीत थी। साहब इसे लेने को कहते हैं। हमारा गुजर-बसर इसी जमीन से होता है! मुंसीजी से कह रहा हूँ, किसी तरह इस झगड़े को मिटा दीजिए। नजर-नियाज देने को भी तैयार हूँ, मुआ मुंसीजी सुनते ही नहीं।

जैनब-सुनेंगे क्यों नहीं, सुनेंगे न


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