प्रभु सेवक-जी नहीं।
जॉन सेवक-अब तो फिर इतनी उच्छृंखलता न करोगे?
प्रभु सेवक ने मुस्कराकर कहा-जी नहीं।
अध्याय 6
धर्मभीरुता में जहाँ अनेक गुण हैं, वहाँ एक अवगुण भी है; वह सरल होती है। पाखंडियों का दाँव उस पर सहज ही में चल जाता है। धर्मभीरु प्राणी तार्किक नहीं होता। उसकी विवेचना-शक्ति शिथिल हो जाती है। ताहिर अली ने जब से अपनी दोनों विमाताओं की बातेें सुनी थीं, उनके हृदय में घोर अशांति हो रही थी। बार-बार खुदा से दुआ माँगते थे,
प्रभु सेवक-जी नहीं।
जॉन सेवक-अब तो फिर इतनी उच्छृंखलता न करोगे?
प्रभु सेवक ने मुस्कराकर कहा-जी नहीं।
अध्याय 6
धर्मभीरुता में जहाँ अनेक गुण हैं, वहाँ एक अवगुण भी है; वह सरल होती है। पाखंडियों का दाँव उस पर सहज ही में चल जाता है। धर्मभीरु प्राणी तार्किक नहीं होता। उसकी विवेचना-शक्ति शिथिल हो जाती है। ताहिर अली ने जब से अपनी दोनों विमाताओं की बातेें सुनी थीं, उनके हृदय में घोर अशांति हो रही थी। बार-बार खुदा से दुआ माँगते थे,