जब भगवान् मुझे यों ही खाने-भर को देते हैं, तो इसे क्यों उठाऊँ।
राजा साहब-अच्छा, तो सूरदास दान लेता ही नहीं, देता भी है। ऐसे प्राणियों के दर्शन ही से पुण्य होता है।
नायकराम की निगाह में सूरदास का इतना आदर कभी न हुआ था। बोले-हुजूर, उस जन्म का कोई बड़ा भारी महात्मा है।
राजा साहब-उस जन्म का नहीं, इस जन्म का महात्मा है।
सच्चा दानी प्रसिध्दि का अभिलाषी नहीं होता। सूरदास को अपने त्याग और दान के महत्व का ज्ञान ही न था। शायद होता,
जब भगवान् मुझे यों ही खाने-भर को देते हैं, तो इसे क्यों उठाऊँ।
राजा साहब-अच्छा, तो सूरदास दान लेता ही नहीं, देता भी है। ऐसे प्राणियों के दर्शन ही से पुण्य होता है।
नायकराम की निगाह में सूरदास का इतना आदर कभी न हुआ था। बोले-हुजूर, उस जन्म का कोई बड़ा भारी महात्मा है।
राजा साहब-उस जन्म का नहीं, इस जन्म का महात्मा है।
सच्चा दानी प्रसिध्दि का अभिलाषी नहीं होता। सूरदास को अपने त्याग और दान के महत्व का ज्ञान ही न था। शायद होता,