रंगभूमि - Rangbhumi

रोकर बोली-बहन, ईश्वर के लिए जरा पुस्तक बंद कर दो; चली जाऊँगी, तो फिर खूब पढ़ना। वहाँ से तुम्हें छेड़ने न आऊँगी।

सोफी ने इंदु की ओर देखा, मानो समाधिा टूटी! उसकी ऑंखों में ऑंसू थे, मुख उतरा हुआ, सिर के बाल बिखरे हुए। बोली-अरे! इंदु, बात क्या है? रोती क्यों हो?

इंदु-तुम अपनी किताब देखो, तुम्हें किसी के रोने-धोने की क्या परवा है! ईश्वर ने न जाने क्यों मुझे तुझ-सा हृदय नहीं दिया।

सोफ़िया-बहन, क्षमा करना, मैं एक बड़ी


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रोकर बोली-बहन, ईश्वर के लिए जरा पुस्तक बंद कर दो; चली जाऊँगी, तो फिर खूब पढ़ना। वहाँ से तुम्हें छेड़ने न आऊँगी।

सोफी ने इंदु की ओर देखा, मानो समाधिा टूटी! उसकी ऑंखों में ऑंसू थे, मुख उतरा हुआ, सिर के बाल बिखरे हुए। बोली-अरे! इंदु, बात क्या है? रोती क्यों हो?

इंदु-तुम अपनी किताब देखो, तुम्हें किसी के रोने-धोने की क्या परवा है! ईश्वर ने न जाने क्यों मुझे तुझ-सा हृदय नहीं दिया।

सोफ़िया-बहन, क्षमा करना, मैं एक बड़ी


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