रंगभूमि - Rangbhumi

विचारों में पड़ी सारी रात करवटें बदलती रही। प्रात:काल उठी, तो द्वार पर उसके लिए पालकी तैयार खड़ी थी। वह माता के गले से लिपटकर रोई, पिता के चरणों को ऑंसुओं से धोया और घर से चली। रास्ते में सोफी का कमरा पड़ता था। इंदु ने उस कमरे की ओर ताका भी नहीं। सोफी उठकर द्वार पर आई, और ऑंखों में ऑंसू भरे हुए उससे हाथ मिलाया। इंदु ने जल्दी से हाथ छुड़ा लिया और आगे बढ़ गई।


अध्याय 9

सोफ़िया इस समय उस अवस्था में थी, जब एक साधारण हँसी की बात,


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विचारों में पड़ी सारी रात करवटें बदलती रही। प्रात:काल उठी, तो द्वार पर उसके लिए पालकी तैयार खड़ी थी। वह माता के गले से लिपटकर रोई, पिता के चरणों को ऑंसुओं से धोया और घर से चली। रास्ते में सोफी का कमरा पड़ता था। इंदु ने उस कमरे की ओर ताका भी नहीं। सोफी उठकर द्वार पर आई, और ऑंखों में ऑंसू भरे हुए उससे हाथ मिलाया। इंदु ने जल्दी से हाथ छुड़ा लिया और आगे बढ़ गई।


अध्याय 9

सोफ़िया इस समय उस अवस्था में थी, जब एक साधारण हँसी की बात,


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