रंगभूमि - Rangbhumi



प्रभु सेवक-फिर से कहिए।

विनयसिंह-बार-बार वही बातें क्या कहूँ।

प्रभु सेवक-मैं आपके कथन का भावार्थ कर दूँ?

विनयसिंह-मेरे मन में एक बात आई, कह दी; आप व्यर्थ उसे इतना बढ़ा रहे हैं।

प्रभु सेवक-आखिर आप उन भावों को सोफी के सामने प्रकट करते क्यों शर्माते हैं?

विनयसिंह-शर्माता नहीं हूँ, लेकिन आपसे मेरा कोई विवाद नहीं है। आपको मानव-जीवन का यह आदर्श सर्वोत्ताम प्रतीत होता है, मुझे वह अपनी वर्तमान अवस्था के प्रतिकूल जान पड़ता है। इसमें झगड़े की कोई बात नहीं है।


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प्रभु सेवक-फिर से कहिए।

विनयसिंह-बार-बार वही बातें क्या कहूँ।

प्रभु सेवक-मैं आपके कथन का भावार्थ कर दूँ?

विनयसिंह-मेरे मन में एक बात आई, कह दी; आप व्यर्थ उसे इतना बढ़ा रहे हैं।

प्रभु सेवक-आखिर आप उन भावों को सोफी के सामने प्रकट करते क्यों शर्माते हैं?

विनयसिंह-शर्माता नहीं हूँ, लेकिन आपसे मेरा कोई विवाद नहीं है। आपको मानव-जीवन का यह आदर्श सर्वोत्ताम प्रतीत होता है, मुझे वह अपनी वर्तमान अवस्था के प्रतिकूल जान पड़ता है। इसमें झगड़े की कोई बात नहीं है।


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