पुरुषों के लिए नहीं, जाओ।
विनय को फिर कुछ कहने की हिम्मत न हुई, आहिस्ता से उठे और चले गए।
सोफी ने साहस करके कहा-आजकल तो राजपूताने में आग बरसती होगी!
जाह्नवी ने निश्चयात्मक भाव से कहा-र्
कर्तव्य कभी आग और पानी की परवा नहीं करता। जाओ, तुम भी सो रहो, सवेरे उठना है।
सोफी सारी रात बैठी रही। विनय से एक बार मिलने के लिए उसका हृदय तड़फड़ा रहा था-आह! वह कल चले जाएँगे, और मैं उनसे विदा भी न हो सकूँगी। वह बार-बार खिड़की
पुरुषों के लिए नहीं, जाओ।
विनय को फिर कुछ कहने की हिम्मत न हुई, आहिस्ता से उठे और चले गए।
सोफी ने साहस करके कहा-आजकल तो राजपूताने में आग बरसती होगी!
जाह्नवी ने निश्चयात्मक भाव से कहा-र्
कर्तव्य कभी आग और पानी की परवा नहीं करता। जाओ, तुम भी सो रहो, सवेरे उठना है।
सोफी सारी रात बैठी रही। विनय से एक बार मिलने के लिए उसका हृदय तड़फड़ा रहा था-आह! वह कल चले जाएँगे, और मैं उनसे विदा भी न हो सकूँगी। वह बार-बार खिड़की