रात कटी। प्रात:काल ताहिर अली की ऑंखें खुलीं; दर्द से अब भी कराह रहे थे; पर अब अवस्था उतनी शोचनीय न थी। तकिये के सहारे बैठ गए। कुल्सूम ने उन्हें चमारों से बातें करते सुना। उसे ऐसा जान पड़ा कि इनका स्वर कुछ विकृत हो गया है। चमारों ने ज्यों ही उन्हें होश में देखा, समझ गए कि अब हमारी जरूरत नहीं रही, अब घरवाली की सेवा-शुश्रूषा का अवसर आ गया। एक-एक करके विदा हो गए। अब कुल्सूम ने चित्ता सावधान किया और पति के पास आ बैठी। ताहिर अली ने उसे देखा,
रात कटी। प्रात:काल ताहिर अली की ऑंखें खुलीं; दर्द से अब भी कराह रहे थे; पर अब अवस्था उतनी शोचनीय न थी। तकिये के सहारे बैठ गए। कुल्सूम ने उन्हें चमारों से बातें करते सुना। उसे ऐसा जान पड़ा कि इनका स्वर कुछ विकृत हो गया है। चमारों ने ज्यों ही उन्हें होश में देखा, समझ गए कि अब हमारी जरूरत नहीं रही, अब घरवाली की सेवा-शुश्रूषा का अवसर आ गया। एक-एक करके विदा हो गए। अब कुल्सूम ने चित्ता सावधान किया और पति के पास आ बैठी। ताहिर अली ने उसे देखा,