रंगभूमि - Rangbhumi

दिए देता है? देखती हो कि अच्छे-अच्छे पढ़े-लिखे आदमी मारे-मारे फिरते हैं।

कुल्सूम-न इतना मिलेगा, न सही; इसका आधा तो मिलेगा! दोंनों वक्त न खाएँगे, एक ही वक्त सही; जान तो आफत में न रहेगी।

ताहिर-तुम एक वक्त खाकर खुश रहोगी, घर में और लोग भी तो हैं, उनके दु:खड़े रोज कौन सुनेगा? मुझे अपनी जान से दुश्मनी थोड़े ही है; पर मजबूर हूँ। खुदा को जो मंजूर होगा, वह पेश आएगा।

कुल्सूम-घर के लोगों के पीछे क्या जान दे दोगे?

ताहिर-कैसी बातें करती हो,


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दिए देता है? देखती हो कि अच्छे-अच्छे पढ़े-लिखे आदमी मारे-मारे फिरते हैं।

कुल्सूम-न इतना मिलेगा, न सही; इसका आधा तो मिलेगा! दोंनों वक्त न खाएँगे, एक ही वक्त सही; जान तो आफत में न रहेगी।

ताहिर-तुम एक वक्त खाकर खुश रहोगी, घर में और लोग भी तो हैं, उनके दु:खड़े रोज कौन सुनेगा? मुझे अपनी जान से दुश्मनी थोड़े ही है; पर मजबूर हूँ। खुदा को जो मंजूर होगा, वह पेश आएगा।

कुल्सूम-घर के लोगों के पीछे क्या जान दे दोगे?

ताहिर-कैसी बातें करती हो,


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