तो मैं उसे छाँटकर अभी सुखाए देती हूँ।
बुढ़िया इतनी क्षमाशील न थी, हजारों गालियाँ सुनाईं और गीली धोती पहने बैठी रही। इतने में भैरों दूकान से आया और सुभागी से बोला-जल्दी खाना ला, आज संगत होनेवाली है। आओ अम्माँ, तुम भी खा लो।
बुढ़िया बोली-नहाकर गीली धोती पहने बैठी हूँ। अब अपने हाथों धोती धो लिया करूँगी।
भैरों-क्या इसने धोती नहीं धोई?
बुढ़िया-वह अब मेरी धोती क्यों धोने लगी। घर की मालकिन है। यही क्या कम है कि एक रोटी खाने को दे देती है!
तो मैं उसे छाँटकर अभी सुखाए देती हूँ।
बुढ़िया इतनी क्षमाशील न थी, हजारों गालियाँ सुनाईं और गीली धोती पहने बैठी रही। इतने में भैरों दूकान से आया और सुभागी से बोला-जल्दी खाना ला, आज संगत होनेवाली है। आओ अम्माँ, तुम भी खा लो।
बुढ़िया बोली-नहाकर गीली धोती पहने बैठी हूँ। अब अपने हाथों धोती धो लिया करूँगी।
भैरों-क्या इसने धोती नहीं धोई?
बुढ़िया-वह अब मेरी धोती क्यों धोने लगी। घर की मालकिन है। यही क्या कम है कि एक रोटी खाने को दे देती है!