अच्छी सूरत देखकर ऑंखें खुल जाती हैं क्या मुहल्ले ही में?
सूरदास-पंडाजी, तुम्हें दिल्लगी सूझी है और यहाँ मुख में कालिख लगाई जा रही है। अंधा था, अपाहिज था, भिखारी था, नीच था, चोरी-बदमासी के इलजाम से तो बचा हुआ था! आज वह इलजाम भी लग गया।
बजरंगी-आदमी जैसा आप होता है, वैसा ही दूसरों को समझता है।
भैरों-तुम कहाँ के बड़े साधु हो। अभी आज ही लाठी चलाकर आए हो। मैं दो साल से देख रहा हूँ, मेरी घरवाली इससे आकर अकेले में घंटों
अच्छी सूरत देखकर ऑंखें खुल जाती हैं क्या मुहल्ले ही में?
सूरदास-पंडाजी, तुम्हें दिल्लगी सूझी है और यहाँ मुख में कालिख लगाई जा रही है। अंधा था, अपाहिज था, भिखारी था, नीच था, चोरी-बदमासी के इलजाम से तो बचा हुआ था! आज वह इलजाम भी लग गया।
बजरंगी-आदमी जैसा आप होता है, वैसा ही दूसरों को समझता है।
भैरों-तुम कहाँ के बड़े साधु हो। अभी आज ही लाठी चलाकर आए हो। मैं दो साल से देख रहा हूँ, मेरी घरवाली इससे आकर अकेले में घंटों