जगधार के मन में ईर्ष्या का अंकुर जमा। वह भैरों के घर से लौटा तो देखा कि सूरदास राख को बटोरकर उसे आटे की भाँति गूँधा रहा है। सारा शरीर भस्म से ढका हुआ है और पसीने की धारें निकल रही हैं। बोला-सूरे, क्या ढूँढ़ते हो?
सूरदास-कुछ नहीं। यहाँ रखा ही क्या था! यही लोटा-तवा देख रहा था।
जगधार-और वह थैली किसकी है, जो भैरों के पास है?
सूरदास चौंका। क्या इसीलिए भैरों आया था? जरूर यही बात है। घर में आग लगाने के पहले रुपये निकाल लिए होंगे।
जगधार के मन में ईर्ष्या का अंकुर जमा। वह भैरों के घर से लौटा तो देखा कि सूरदास राख को बटोरकर उसे आटे की भाँति गूँधा रहा है। सारा शरीर भस्म से ढका हुआ है और पसीने की धारें निकल रही हैं। बोला-सूरे, क्या ढूँढ़ते हो?
सूरदास-कुछ नहीं। यहाँ रखा ही क्या था! यही लोटा-तवा देख रहा था।
जगधार-और वह थैली किसकी है, जो भैरों के पास है?
सूरदास चौंका। क्या इसीलिए भैरों आया था? जरूर यही बात है। घर में आग लगाने के पहले रुपये निकाल लिए होंगे।