ठाकुरदीन-मेरी दूकान पर खड़े हो जाओ, जी खुश हो जाता है। केवड़े और गुलाब की सुगंधा उड़ती है। इसकी दूकान पर कोई खड़ा हो जाए, तो बदबू के मारे नाक फटने लगती है। खड़ा नहीं रहा जाता। परनाले में भी इतनी दुर्गंधा नहीं होती।
बजरंगी-मुझे जो घंटे-भर के लिए राज मिल जाता, तो सबसे पहले शहर-भर की ताड़ी की दूकानों में आग लगवा देता।
नायकराम-अब बताओ भैरों, इसका जवाब दो। दुर्गंधा तो सचमुच उड़ती है, है कोई जवाब?
भैरों-जवाब एक नहीं,
ठाकुरदीन-मेरी दूकान पर खड़े हो जाओ, जी खुश हो जाता है। केवड़े और गुलाब की सुगंधा उड़ती है। इसकी दूकान पर कोई खड़ा हो जाए, तो बदबू के मारे नाक फटने लगती है। खड़ा नहीं रहा जाता। परनाले में भी इतनी दुर्गंधा नहीं होती।
बजरंगी-मुझे जो घंटे-भर के लिए राज मिल जाता, तो सबसे पहले शहर-भर की ताड़ी की दूकानों में आग लगवा देता।
नायकराम-अब बताओ भैरों, इसका जवाब दो। दुर्गंधा तो सचमुच उड़ती है, है कोई जवाब?
भैरों-जवाब एक नहीं,