उनकी भर्त्सना और अपनी भ्रांति सब कुछ भूल गई। हृदय के एक-एक तार से यही धवनि निकल रही थी-अब विनय से फिर भेंट न होगी।
मिसेज़ सेवक बोलीं-कुँवर साहब से भी मिल लूँ।
सोफ़िया डर रही थी कि कहीं मामा को रात की घटना की खबर न मिल जाए, कुँवर साहब कहीं दिल्लगी-ही-दिल्लगी में कह न डालें। बोली-उनसे मिलने में देर होगी, फिर मिल लीजिएगा।
मिसेज़ सेवक-फिर किसे इतनी फुर्सत है!
दोनों कुँवर साहब के दीवानखाने में पहुँचीं। यहाँ इस वक्त
उनकी भर्त्सना और अपनी भ्रांति सब कुछ भूल गई। हृदय के एक-एक तार से यही धवनि निकल रही थी-अब विनय से फिर भेंट न होगी।
मिसेज़ सेवक बोलीं-कुँवर साहब से भी मिल लूँ।
सोफ़िया डर रही थी कि कहीं मामा को रात की घटना की खबर न मिल जाए, कुँवर साहब कहीं दिल्लगी-ही-दिल्लगी में कह न डालें। बोली-उनसे मिलने में देर होगी, फिर मिल लीजिएगा।
मिसेज़ सेवक-फिर किसे इतनी फुर्सत है!
दोनों कुँवर साहब के दीवानखाने में पहुँचीं। यहाँ इस वक्त