रंगभूमि - Rangbhumi

लेकिन इतना अख्तियार भी नहीं कि घर से बाहर जा सकूँ। मुझसे तो लौंडियाँ ही अच्छी हैं। चित्ता बहुत खिन्न हुआ, ऑंखें सजल हो गईं। घंटी बजाई और लौंडी से कहा-गाड़ी खुलवा दो, मैं स्टेशन न जाऊँगी।

महेंद्रकुमार भी उसके पीछे-पीछे कमरे में जाकर बोले-कहीं सैर क्यों नहीं कर आतीं?

इंदु-नहीं, बादल घिरा हुआ है, भीग जाऊँगी।

राजा साहब-क्या नाराज हो गईं?

इंदु-नाराज क्यों हूँ? आपके हुक्म की लौंडी हूँ। आपने कहा, मत जाओ, न जाऊँगी।

राजा


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लेकिन इतना अख्तियार भी नहीं कि घर से बाहर जा सकूँ। मुझसे तो लौंडियाँ ही अच्छी हैं। चित्ता बहुत खिन्न हुआ, ऑंखें सजल हो गईं। घंटी बजाई और लौंडी से कहा-गाड़ी खुलवा दो, मैं स्टेशन न जाऊँगी।

महेंद्रकुमार भी उसके पीछे-पीछे कमरे में जाकर बोले-कहीं सैर क्यों नहीं कर आतीं?

इंदु-नहीं, बादल घिरा हुआ है, भीग जाऊँगी।

राजा साहब-क्या नाराज हो गईं?

इंदु-नाराज क्यों हूँ? आपके हुक्म की लौंडी हूँ। आपने कहा, मत जाओ, न जाऊँगी।

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