रंगभूमि - Rangbhumi



राजा ने निराश होकर कहा-जैसी तुम्हारी इच्छा! मालूम होता है, हमारे और तुम्हारे ग्रहों में कोई मौलिक विरोध है, जो पग-पग पर अपना फल दिखलाता रहता है।

यह कहकर वह मोटर पर सवार हो गए, और बड़े वेग से स्टेशन की तरफ से चले। बग्घी भी आगे बढ़ी। कोचवान ने पूछा-हुजूर गईं क्यों नहीं? सरकार बुरा मान गए।

इंदु ने इसका कुछ जवाब न दिया। वह सोच रही थी-क्या मुझसे फिर भूल हुई? क्या मेरा जाना उचित था? क्या वह शुध्द हृदय से मेरे जाने के


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राजा ने निराश होकर कहा-जैसी तुम्हारी इच्छा! मालूम होता है, हमारे और तुम्हारे ग्रहों में कोई मौलिक विरोध है, जो पग-पग पर अपना फल दिखलाता रहता है।

यह कहकर वह मोटर पर सवार हो गए, और बड़े वेग से स्टेशन की तरफ से चले। बग्घी भी आगे बढ़ी। कोचवान ने पूछा-हुजूर गईं क्यों नहीं? सरकार बुरा मान गए।

इंदु ने इसका कुछ जवाब न दिया। वह सोच रही थी-क्या मुझसे फिर भूल हुई? क्या मेरा जाना उचित था? क्या वह शुध्द हृदय से मेरे जाने के


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