तो कानों पर उँगली रखते हैं। मुझे रोने की स्वाधीनता भी नहीं। 'जबर मारे और रोने न दे।' आठ दिन गुजर गए, बात भी नहीं पूछी कि मरती हो या जीती। बिल्कुल उसी तरह पड़ी हूँ, जैसे कोई सराय हो। इससे तो कहीं अच्छा था कि मर जाती। सुख गया, आराम गया, पल्ले क्या पड़ा, रोना और झींकना। जब यही दशा है, तो कब तक निभेगी, 'बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी?' दोनों के दिल एक दूसरे से फिर जाएँगे, कोई किसी की सूरत भी न देखना चाहेगा।
शाम हो गई थी। इंदु का चित्ता बहुत घबरा रहा था। उसने सोचा,
तो कानों पर उँगली रखते हैं। मुझे रोने की स्वाधीनता भी नहीं। 'जबर मारे और रोने न दे।' आठ दिन गुजर गए, बात भी नहीं पूछी कि मरती हो या जीती। बिल्कुल उसी तरह पड़ी हूँ, जैसे कोई सराय हो। इससे तो कहीं अच्छा था कि मर जाती। सुख गया, आराम गया, पल्ले क्या पड़ा, रोना और झींकना। जब यही दशा है, तो कब तक निभेगी, 'बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी?' दोनों के दिल एक दूसरे से फिर जाएँगे, कोई किसी की सूरत भी न देखना चाहेगा।
शाम हो गई थी। इंदु का चित्ता बहुत घबरा रहा था। उसने सोचा,