रंगभूमि - Rangbhumi

शरीर इतना दुर्बल कि पसलियों की एक-एक हड़डी गिनी जा सकती है।

हमारी अभिलाषाएँ ही जीवन का स्रोत हैं; उन्हीं पर तुषारपात हो जाए, तो जीवन का प्रवाह क्यों न शिथिल हो जाए!

उनके अंतस्तल में निरंतर भीषण संग्राम होता रहता है। सेवा-मार्ग उनका धयेय था। प्रेम के काँटें उसमें बाधक हो रहे थे। उन्हें अपने मार्ग से हटाने के लिए वह सदैव यत्न करते रहते हैं। कभी-कभी वह आत्मग्लानि से विकल होकर सोचते हैं, सोफी ने मुझे उस अग्नि-कुंड से


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शरीर इतना दुर्बल कि पसलियों की एक-एक हड़डी गिनी जा सकती है।

हमारी अभिलाषाएँ ही जीवन का स्रोत हैं; उन्हीं पर तुषारपात हो जाए, तो जीवन का प्रवाह क्यों न शिथिल हो जाए!

उनके अंतस्तल में निरंतर भीषण संग्राम होता रहता है। सेवा-मार्ग उनका धयेय था। प्रेम के काँटें उसमें बाधक हो रहे थे। उन्हें अपने मार्ग से हटाने के लिए वह सदैव यत्न करते रहते हैं। कभी-कभी वह आत्मग्लानि से विकल होकर सोचते हैं, सोफी ने मुझे उस अग्नि-कुंड से


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