वर्ग उनसे बदगुमान होते जाते हैं। उनके विचार में प्रजा दिन-दिन सरकश होती जाती है। दारोगाजी की मुट्ठियाँ अब गर्म नहीं होतीं, कामदार और अन्य कर्मचारियों के यहाँ मुकदमे नहीं आते, कुछ हत्थे नहीं चढ़ता; यह प्रजा में विद्रोहात्मक भाव के लक्षण नहीं, तो क्या है? ये ही विद्रोह के अंकुर हैं, इन्हें उखाड़ देने ही में कुशल है।
जसवंतनगर से दरबार को नित्य नई-नई सूचनाएँ-कुछ यथार्थ, कुछ कल्पित-भेजी जाती हैं, और विनयसिंह को जाब्ते के
वर्ग उनसे बदगुमान होते जाते हैं। उनके विचार में प्रजा दिन-दिन सरकश होती जाती है। दारोगाजी की मुट्ठियाँ अब गर्म नहीं होतीं, कामदार और अन्य कर्मचारियों के यहाँ मुकदमे नहीं आते, कुछ हत्थे नहीं चढ़ता; यह प्रजा में विद्रोहात्मक भाव के लक्षण नहीं, तो क्या है? ये ही विद्रोह के अंकुर हैं, इन्हें उखाड़ देने ही में कुशल है।
जसवंतनगर से दरबार को नित्य नई-नई सूचनाएँ-कुछ यथार्थ, कुछ कल्पित-भेजी जाती हैं, और विनयसिंह को जाब्ते के