विनय ने मुस्कराकर कहा-अब तो डाकिए की जान न लोगे? तुमसे हमें डर लगता है।
सरदार-महाराज, हमें अब लज्जित न कीजिए। हमारा अपराध क्षमा कीजिए। डाकिया महाशय, तुम आज किसी भले आदमी का मुँह देखकर उठे थे, नहीं तो अब तक तुम्हारा प्राण-पखेरू आकाश में उड़ता होता। मेरा नाम सुना है न? वीरपालसिंह मैं ही हूँ, जिसने राज्य के नौकरों को नेस्तनाबूद करने का प्रण कर लिया है।
विनय-राज्य के नौकरों पर इतना अत्याचार क्यों करते हो?
वीरपाल-महाराज,
विनय ने मुस्कराकर कहा-अब तो डाकिए की जान न लोगे? तुमसे हमें डर लगता है।
सरदार-महाराज, हमें अब लज्जित न कीजिए। हमारा अपराध क्षमा कीजिए। डाकिया महाशय, तुम आज किसी भले आदमी का मुँह देखकर उठे थे, नहीं तो अब तक तुम्हारा प्राण-पखेरू आकाश में उड़ता होता। मेरा नाम सुना है न? वीरपालसिंह मैं ही हूँ, जिसने राज्य के नौकरों को नेस्तनाबूद करने का प्रण कर लिया है।
विनय-राज्य के नौकरों पर इतना अत्याचार क्यों करते हो?
वीरपाल-महाराज,