कम न हुआ था। उनकी आराम-कुर्सी बंँगले के सायबान में पड़ी रहती थी। उस पर वह सुबह से शाम तक बैठे जॉन सेवक की फिजूलखर्ची और घर की बरबादी का रोना रोया करते थे। वह अब भी नियमित रूप से पुत्रा को घंटे-दो-घंटे उपदेश दिया करते थे, और शायद इसी उपदेश का फल था कि जॉन सेवक का धान और मान दिनोंदिन बढ़ता जाता था। 'किफायत' उनके जीवन का मूल तत्तव था। और इसका उल्लंघन उन्हें असह्य था। वह अपने घर में धान का अपव्यय नहीं देख सकते थे, चाहे वह
कम न हुआ था। उनकी आराम-कुर्सी बंँगले के सायबान में पड़ी रहती थी। उस पर वह सुबह से शाम तक बैठे जॉन सेवक की फिजूलखर्ची और घर की बरबादी का रोना रोया करते थे। वह अब भी नियमित रूप से पुत्रा को घंटे-दो-घंटे उपदेश दिया करते थे, और शायद इसी उपदेश का फल था कि जॉन सेवक का धान और मान दिनोंदिन बढ़ता जाता था। 'किफायत' उनके जीवन का मूल तत्तव था। और इसका उल्लंघन उन्हें असह्य था। वह अपने घर में धान का अपव्यय नहीं देख सकते थे, चाहे वह