रंगभूमि - Rangbhumi

जाकर उन्हें खींच लाता था। लौटती बार वह यथासाधय खाली हाथ न लौटते थे, कभी दो-चार पपीते मिल जाते, कभी नारंगियाँ, कभी सेर-आधा-सेर मकोय। पादरी उनका बहुत सम्मान करता था। उनकी सारी उम्मत (अनुयायियों की मंडली) में इतना वयोवृध्द और दूसरा आदमी न था, उस पर धर्म का इतना प्रेमी! वह उसके धार्मोपदेशों को जितनी तन्मयता से सुनते थे और जितनी भक्ति से कीर्तन में भाग लेते थे, वह आदर्श कही जा सकती थी।

प्रात:काल था। लोग जलपान करके या छोटी हाजिरी खाकर,


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जाकर उन्हें खींच लाता था। लौटती बार वह यथासाधय खाली हाथ न लौटते थे, कभी दो-चार पपीते मिल जाते, कभी नारंगियाँ, कभी सेर-आधा-सेर मकोय। पादरी उनका बहुत सम्मान करता था। उनकी सारी उम्मत (अनुयायियों की मंडली) में इतना वयोवृध्द और दूसरा आदमी न था, उस पर धर्म का इतना प्रेमी! वह उसके धार्मोपदेशों को जितनी तन्मयता से सुनते थे और जितनी भक्ति से कीर्तन में भाग लेते थे, वह आदर्श कही जा सकती थी।

प्रात:काल था। लोग जलपान करके या छोटी हाजिरी खाकर,


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