शरीर पर उड़ रही वह बुकनी (पीसकर निचोड़ा हुआ भूसा) और सारा कचरा चिपका हुआ, गंदला, नंग-धड़ंग शरीर देखकर मन बार-बार विद्रोह कर उठता। अपने आपसे घिन आती। अरे, इस तरह का दुःख झेल क्यों रहे हो? तुम्हारी इसदेह तथा कर्तृव्य का राष्ट्रों के उदयार्थ होना चाहिए। वह अब माटीमोल हो गया है। फिर इस अंधेरे में ही इतने सारे कष्ट सहते क्यों सड़ रहे हो? इसका तुम्हारे कार्य के लिए, तुम्हारी मातृभूमि के उद्वारार्थ कौड़ी भर उपयोग नहीं है। उधार तुम
शरीर पर उड़ रही वह बुकनी (पीसकर निचोड़ा हुआ भूसा) और सारा कचरा चिपका हुआ, गंदला, नंग-धड़ंग शरीर देखकर मन बार-बार विद्रोह कर उठता। अपने आपसे घिन आती। अरे, इस तरह का दुःख झेल क्यों रहे हो? तुम्हारी इसदेह तथा कर्तृव्य का राष्ट्रों के उदयार्थ होना चाहिए। वह अब माटीमोल हो गया है। फिर इस अंधेरे में ही इतने सारे कष्ट सहते क्यों सड़ रहे हो? इसका तुम्हारे कार्य के लिए, तुम्हारी मातृभूमि के उद्वारार्थ कौड़ी भर उपयोग नहीं है। उधार तुम