से वंचित होना पड़ता था। अब क्या यह बताना भी होगा कि इस तरह पूरे वर्ष उसी तरह कठोर अनुशासन में एवं साधारण अपराध से भी बचकर दंडित हुए बिना वर्ष-यापन करना कितना दुष्कर है। इस अवस्था में पत्र द्वारा अपने आप पर टूटे कष्टों के पहाड़ की जानकारी हिंदुस्थान में पहुंचाने की आशा तो दूर रही, वर्षांत में अपने घर के प्रियजनों के मात्र कुशल-क्षेम का वृत्त भी समझने अथवा उन्हें यह सूचित करने कि अभी तक हम जीवित हैं, की आशा करना निरर्थक था।
से वंचित होना पड़ता था। अब क्या यह बताना भी होगा कि इस तरह पूरे वर्ष उसी तरह कठोर अनुशासन में एवं साधारण अपराध से भी बचकर दंडित हुए बिना वर्ष-यापन करना कितना दुष्कर है। इस अवस्था में पत्र द्वारा अपने आप पर टूटे कष्टों के पहाड़ की जानकारी हिंदुस्थान में पहुंचाने की आशा तो दूर रही, वर्षांत में अपने घर के प्रियजनों के मात्र कुशल-क्षेम का वृत्त भी समझने अथवा उन्हें यह सूचित करने कि अभी तक हम जीवित हैं, की आशा करना निरर्थक था।