है और न मैं नौकरी चाहता हूं। मैं आज ही यहां से चला जाऊंगा।'
डिप्टी-'जब तक हाईकोर्ट का फैसला न हो जाय, तब तक आप कहीं नहीं जा सकता।'
रमानाथ-'क्यों?'
डिप्टी-'कमिश्नर साहब का यह हुक्म है।'
रमानाथ-'मैं किसी का गुश्लाम नहीं हूं।
इंस्पेक्टर-'बाबू रमानाथ, आप क्यों बना-बनाया खेल बिगाड़ रहे हैं?जो कुछ होना था, वह हो गया। दस-पांच दिन में हाईकोर्ट से फैसले की तसदीक हो जायगी आपकी बेहतरी इसी में है कि जो सिला मिल रहा है,
है और न मैं नौकरी चाहता हूं। मैं आज ही यहां से चला जाऊंगा।'
डिप्टी-'जब तक हाईकोर्ट का फैसला न हो जाय, तब तक आप कहीं नहीं जा सकता।'
रमानाथ-'क्यों?'
डिप्टी-'कमिश्नर साहब का यह हुक्म है।'
रमानाथ-'मैं किसी का गुश्लाम नहीं हूं।
इंस्पेक्टर-'बाबू रमानाथ, आप क्यों बना-बनाया खेल बिगाड़ रहे हैं?जो कुछ होना था, वह हो गया। दस-पांच दिन में हाईकोर्ट से फैसले की तसदीक हो जायगी आपकी बेहतरी इसी में है कि जो सिला मिल रहा है,