रमानाथ-'कोई तदबीर बताओ।'
ज़ोहरा -'मैं उसे पार्क में खड़ी कर आऊंगी। तुम डिप्टी साहब के साथ वहां जाना और किसी बहाने से उससे मिल लेना। इसके सिवा तो मुझे और कुछ नहीं सूझता।
रमा अभी कुछ कहना ही चाहता था कि दारोग़ाजी ने पुकारा, 'मुझे भी खिलवत में आने की इजाज़त है? '
दोनों संभल बैठे और द्वार खोल दिया। दारोग़ाजी मुस्कराते हुए आए और ज़ोहरा की बग़ल में बैठकर बोले, 'यहां आज सन्नाटा कैसा! क्या आज खजाना खाली है? ज़ोहरा -' आज अपने दस्ते-हिनाई से एक जाम भर कर दो।'
रमानाथ-'कोई तदबीर बताओ।'
ज़ोहरा -'मैं उसे पार्क में खड़ी कर आऊंगी। तुम डिप्टी साहब के साथ वहां जाना और किसी बहाने से उससे मिल लेना। इसके सिवा तो मुझे और कुछ नहीं सूझता।
रमा अभी कुछ कहना ही चाहता था कि दारोग़ाजी ने पुकारा, 'मुझे भी खिलवत में आने की इजाज़त है? '
दोनों संभल बैठे और द्वार खोल दिया। दारोग़ाजी मुस्कराते हुए आए और ज़ोहरा की बग़ल में बैठकर बोले, 'यहां आज सन्नाटा कैसा! क्या आज खजाना खाली है? ज़ोहरा -' आज अपने दस्ते-हिनाई से एक जाम भर कर दो।'