वह घाट के समीप पहुंची, तो प्रकाश हो गया था। सहसा उसने रतन को अपनी मोटर पर आते देखा। उसने चाहा, सिर झुकाकर मुंह छिपा ले, पर रतन ने दूर ही से पहचान लिया, मोटर रोककर बोली,कहां जा रही हो बहन, 'यह पीठ पर बेग कैसा है?'
जालपा ने घूंघट हटा लिया और निद्यशंक होकर बोली,'गंगा-स्नान करने जा रही हूं।'
रतन-'मैं तो स्नान करके लौट आई, लेकिन चलो, तुम्हारे साथ चलती हूं। तुम्हें घर पहुंचाकर लौट जाऊंगी। बेग रख दो।'
जालपा-'नहीं-नहीं,
वह घाट के समीप पहुंची, तो प्रकाश हो गया था। सहसा उसने रतन को अपनी मोटर पर आते देखा। उसने चाहा, सिर झुकाकर मुंह छिपा ले, पर रतन ने दूर ही से पहचान लिया, मोटर रोककर बोली,कहां जा रही हो बहन, 'यह पीठ पर बेग कैसा है?'
जालपा ने घूंघट हटा लिया और निद्यशंक होकर बोली,'गंगा-स्नान करने जा रही हूं।'
रतन-'मैं तो स्नान करके लौट आई, लेकिन चलो, तुम्हारे साथ चलती हूं। तुम्हें घर पहुंचाकर लौट जाऊंगी। बेग रख दो।'
जालपा-'नहीं-नहीं,