तुम कहां ठहरे थे, बाबूजी? मैंने सारा कलकत्ता छान मारा। फिर जालपा की मान-प्रतिमा सामने आ खड़ी हुई।
सहसा देवीदीन ने आकर कहा, 'भैया, दस बज गए, चलो बाज़ार होते आवें।'
रमा ने चौंककर पूछा, 'क्या दस बज गए?'
देवीदीन-' 'दस नहीं, ग्यारह का अमल होगा।'
रमा चलने को तैयार हुआ, लेकिन द्वार तक आकर रूक गया।
देवीदीन ने पूछा,'क्यों खड़े कैसे हो गए?'
''तुम्हीं चले जाओ, मैं जाकर क्या करूंगा!'
''क्या डर रहे हो?'
''नहीं, डर नहीं रहा हूं, मगर क्या फायदा?'
तुम कहां ठहरे थे, बाबूजी? मैंने सारा कलकत्ता छान मारा। फिर जालपा की मान-प्रतिमा सामने आ खड़ी हुई।
सहसा देवीदीन ने आकर कहा, 'भैया, दस बज गए, चलो बाज़ार होते आवें।'
रमा ने चौंककर पूछा, 'क्या दस बज गए?'
देवीदीन-' 'दस नहीं, ग्यारह का अमल होगा।'
रमा चलने को तैयार हुआ, लेकिन द्वार तक आकर रूक गया।
देवीदीन ने पूछा,'क्यों खड़े कैसे हो गए?'
''तुम्हीं चले जाओ, मैं जाकर क्या करूंगा!'
''क्या डर रहे हो?'
''नहीं, डर नहीं रहा हूं, मगर क्या फायदा?'