जालपा ने जाकर देखा, तो रतन गेहूं पीसने में मग्न थी। विनोद के स्वाभाविक आनंद से उसका चेहरा खिला हुआ था। इतनी ही देर में उसके माथे पर पसीने की बूंदें आ गई थीं। उसके बलिष्ठ हाथों में जांत लट्टू के समान नाच रहा था।
जालपा ने हंसकर कहा, 'ओ री, आटा महीन हो, नहीं पैसे न मिलेंगे।'
रतन को सुनाई न दिया। बहरों की भांति अनिश्चित भाव से मुस्कराई।
जालपा ने और ज़ोर से कहा, 'आटा खूब महीन पीसना, नहीं पैसे न पाएगी।' रतन ने भी हंसकर कहा,
जालपा ने जाकर देखा, तो रतन गेहूं पीसने में मग्न थी। विनोद के स्वाभाविक आनंद से उसका चेहरा खिला हुआ था। इतनी ही देर में उसके माथे पर पसीने की बूंदें आ गई थीं। उसके बलिष्ठ हाथों में जांत लट्टू के समान नाच रहा था।
जालपा ने हंसकर कहा, 'ओ री, आटा महीन हो, नहीं पैसे न मिलेंगे।'
रतन को सुनाई न दिया। बहरों की भांति अनिश्चित भाव से मुस्कराई।
जालपा ने और ज़ोर से कहा, 'आटा खूब महीन पीसना, नहीं पैसे न पाएगी।' रतन ने भी हंसकर कहा,