दारोग़ा -'तो अपनी गिन्नियां उठा ले। इसे बाहर निकाल दो जी।'
देवीदीन-'आपका हुकुम है, तो लीजिए जाता हूं। धक्का क्यों दिलवाइएगा।'
दारोग़ा -'कांस्टेबल सेध्द इन्हें हिरासत में रखो। मुंशी से कहो इनका बयान लिख लें।'
देवीदीन के होंठ आवेश से कांप रहे थे। उसके चेहरे पर इतनी व्यग्रता रमा ने कभी नहीं देखी, जैसे कोई चिडिया अपने घोंसले में कौवे को घुसते देखकर विह्नल हो गई हो वह एक मिनट तक थाने के द्वार पर खडारहा, फिर पीछे गिरा और एक सिपाही से कुछ कहा,
दारोग़ा -'तो अपनी गिन्नियां उठा ले। इसे बाहर निकाल दो जी।'
देवीदीन-'आपका हुकुम है, तो लीजिए जाता हूं। धक्का क्यों दिलवाइएगा।'
दारोग़ा -'कांस्टेबल सेध्द इन्हें हिरासत में रखो। मुंशी से कहो इनका बयान लिख लें।'
देवीदीन के होंठ आवेश से कांप रहे थे। उसके चेहरे पर इतनी व्यग्रता रमा ने कभी नहीं देखी, जैसे कोई चिडिया अपने घोंसले में कौवे को घुसते देखकर विह्नल हो गई हो वह एक मिनट तक थाने के द्वार पर खडारहा, फिर पीछे गिरा और एक सिपाही से कुछ कहा,